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आर्यभटाङ्कपद्धतिः

विकिपीडिया, कश्चन स्वतन्त्रः विश्वकोशः
संख्याः शब्दरूपेण रूपान्तरयितुं आर्यभटेन प्रयुक्ता वर्णाक्षराङ्कपद्धतेः सूची (जर्मनभाषायाम्, पश्चिमारबसंख्योपयोगेन)

आर्यभटाङ्कपद्धतिः एकः वर्णाक्षराङ्कपद्धतिः अस्ति या संस्कृतध्वन्याधारितम्। एषा पद्धतिः भारतदेशे षष्ठशताब्द्यां आर्यभटेन प्रवर्तिता, तस्य ग्रन्थे "आर्यभटीयं" इत्यस्य प्रथमाध्याये "गीतिकापदम्" इत्याख्यायाम्। अस्यां पद्धतौ प्रत्येकं व्यञ्जनस्वरसंयोगं सङ्ख्यात्मकमूल्येन योज्यते—उदाहरणार्थं "क" इत्यस्य मूल्यं १, "हौ" इत्यस्य मूल्यं १०^१८ इत्यादि।

इतिहासः

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अस्याङ्कपद्धतेः मूलं "आर्यभटीयस्य" प्रथमाध्यायस्य द्वितीयश्लोके उल्लिखितम्।

वर्गवर्णाः—"क" इत्याद्याः "म" पर्यन्ताः—वर्गस्थानेषु स्थापनीयाः (प्रथमः, शतमः, दशसहस्त्रतमः इत्यादि)। अवर्गवर्णाः—"य", "र", "ल" इत्यादयः—अवर्गस्थानेषु स्थापनीयाः (दशमः, सहस्त्रतमः, लक्षतमः इत्यादि)।

वर्गवर्णानां मूल्यं १, २, ३ ... २५ पर्यन्तम्। अवर्गवर्णानां मूल्यं ३०, ४०, ५० ... १०० पर्यन्तम्। नवमस्वरस्थानात् परं नवचिह्नानि अपि प्रयुज्यन्ते।

स्वराणां मूल्यनिर्धारणम्—

  • अ = १
  • इ = १००
  • उ = १००००
  • ऋ = १००००००
  • ऌ = १०^८
  • ए = १०^१०
  • ओ = १०^१२

आर्यभटः एतां पद्धतिं लघु-महदङ्कयोः गणनायां, खगोलगणनायां च प्रयुक्तवान्।

एषा प्रणाली भिन्नाङ्कानां मिश्रभिन्नाङ्कानां च प्रतिनिधित्वाय अपि योग्यते।

उदाहरणम्—

  • ङ = १⁄५
  • ञ = १⁄१०
  • झार्दम् (झ = ९; अर्धम्) = ४ + १⁄२

उदाहरणम्

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स्थानम् (१०ˣ) सङ्ख्या (देवनागरी) वर्णाक्षराङ्कः विग्रहः (संयुक्ताक्षरविभाजनम्)
१०⁰ ५८ जल ज + ल
१०¹ २४ घिनि घि + नि
१०² ७९ झुशु झु + शु
१०³ ९९ झृसृ झृ + सृ
१०⁴ खॢ ख +

भारतीयाङ्कक्रमेण एककस्थानात् आरम्भः, ततः दशकस्थानम्, शतकस्थानम्, सहस्त्रस्थानम्, अयुतस्थानम्, लक्षस्थानम् इत्यादि। अतः आर्यभटः एककस्थानात् आरम्भं कृतवान्।[]

अन्यं उदाहरणम्—ङिशिबुणॢष्खृ (अर्थः—१५८२२३७५००)। अत्र १०⁶ (ऋ) तथा १०⁸ (ॢ) स्थानानि परस्परं परिवर्तितानि। १०⁶ (ऋ) स्थानं संयुक्ताक्षररूपेण दृश्यते।[] मखि भखि फखि धखि णखि ञखि ङखि हस्झ स्ककि किष्ग श्घखि किघ्व घ्लकि किग्र हक्य धकि किच स्ग झश ङ्व क्ल प्त फ च कलार्धज्याः

सङ्ख्यापट्टिका

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आर्यभटाङ्कपद्धत्यां सङ्ख्यावर्णनाय लघुस्वराः—अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ—नियततया प्रयुज्यन्ते। दीर्घस्वराणां च पृथग्भावः न कृतः। अधोलिखितपत्तिकायां केवलं "क"-सम्बद्धाः (१ × १०ˣ) मूल्याः प्रदत्ताः, किन्तु एते सर्वाङ्कवर्णेषु प्रयोज्यन्ते।[]

वर्णः (व्यञ्जनः) सङ्ख्या अ (१०⁰) इ (१०²) उ (१०⁴) ऋ (१०⁶) ऌ (१०⁸) ए (१०¹⁰) ऐ (१०¹²) ओ (१०¹⁴) औ (१०¹⁶)
कि कु कृ कॢ के कै को कौ
खि खु खृ खॢ खे खै खो खौ
गि गु गृ गॢ गे गै गो गौ
घि घु घृ घॢ घे घै घो घौ
ङि ङु ङृ ङॢ ङे ङै ङो ङौ
चि चु चृ चॢ चे चै चो चौ
छि छु छृ छॢ छे छै छो छौ
जि जु जृ जॢ जे जै जो जौ
झि झु झृ झॢ झे झै झो झौ
१० ञि ञु ञृ ञॢ ञे ञै ञो ञौ
११ टि टु टृ टॢ टे टै टो टौ
१२ ठि ठु ठृ ठॢ ठे ठै ठो ठौ
१३ डि डु डृ डॢ डे डै डो डौ
१४ ढि ढु ढृ ढॢ ढे ढै ढो ढौ
१५ णि णु णृ णॢ णे णै णो णौ
१६ ति तु तृ तॢ ते तै तो तौ
१७ थि थु थृ थॢ थे थै थो थौ
१८ दि दु दृ दॢ दे दै दो दौ
१९ धि धु धृ धॢ धे धै धो धौ
२० नि नु नृ नॢ ने नै नो नौ
२१ पि पु पृ पॢ पे पै पो पौ
२२ फि फु फृ फॢ फे फै फो फौ
२३ बि बु बृ बॢ बे बै बो बौ
२४ भि भु भृ भॢ भे भै भो भौ
२५ मि मु मृ मॢ मे मै मो मौ
३० यि यु यृ यॢ ये यै यो यौ
४० रि रु रृ रॢ रे रै रो रौ
५० लि लु लृ लॢ ले लै लो लौ
६० वि वु वृ वॢ वे वै वो वौ
७० शि शु शृ शॢ शे शै शो शौ
८० षि षु षृ षॢ षे षै षो षौ
९० सि सु सृ सॢ से सै सो सौ
१०० हि हु हृ हॢ हे है हो हौ

अपि पश्यतु

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सन्दर्भः

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  1. Āryabhaṭīya 1(gītikā).3
  2. Roddam, Narasimha (2001). "Sines in terse verse". Nature (Macmillan Magazines Ltd.) 414 (6866): 851. Bibcode:2001Natur.414..851N. PMID 11780041. doi:10.1038/414851a. Unknown parameter |doi-access= ignored (help); Unknown parameter |s2cid= ignored (help)
  3. The Universal History of Numbers. From Prehistory to the Invention of the Computer. New York. pp. 447–450.

१. कुर्ट् एल्फेरिङ्आर्यभटस्य गणितशास्त्रम् भागः १। मूलसंस्कृतग्रन्थस्य पाठः, अनुवादः, टिप्पणी च। विल्हेल्म् फिङ्क् प्रकाशनसंस्था, म्यूनिख् नगरे, संवत् १९७५ ई०।

२. जॉर्ज् इफ्राह्संख्यानां सार्वत्रिकइतिहासः। आदिकालेभ्यः संगणकस्य आविष्कारपर्यन्तम्। जॉन् वाइली एण्ड् सन्स् प्रकाशनसंस्था, न्यूयॉर्क् नगरे, संवत् २००० ई०।

३. बी॰ एल्॰ वान् डेर् वेर्डेन्प्रबुद्धं विज्ञानम्। मिश्रदेशीयं, बाबिलोनियं, यवनदेशीयं च गणितशास्त्रम्। बिर्खहौसर् प्रकाशनसंस्था, बासेल्-श्टुट्गार्ट् नगरे, संवत् १९६६ ई०।

४. आर्यभटस्य संख्याव्यक्तिपद्धतिः — मासः जनवरी, संवत् १९११ ई०। पृष्ठसङ्ख्या १०९–१२६।

५. आर्यभटस्य संख्याव्यक्तिपद्धतिः — पृष्ठसङ्ख्या १०९–१२६।

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