सदस्यः:Nishthara
राजस्थानी भाषा की कविता जोकि हास्य रस से भरपूर है एक बार जरूर पढ़े।
कुटुम्ब नियोजन
रामलाल सैनी
एक कमेरो बूढ़ो ठेरो, सेना सेर दो सेराँ ली।
लम्बो घणों कड़ुम्बो कयाँ, पार पड़ैली मेराँ ली।।
रूघनाथ्या क रींट पड़ै, गंगल्या क वहरी गूमड़ी।
मोठ्यो मांटी खाग्यो, जिसूँ बीकै लटकै तूमड़ी।।
लूलो – लूलो लाख्यों चालै, गड़गो काँटों खोबड़ो।
गोपाल्या क टाँट्यों लड़गों, मोटो होग्यो थोबड़ो।।
नानूड़ो निचलायो कौन्याँ रे, नानू सो काचरों।
गुटखाँ खाताँ पंज्यों टूट्यो, गंज्यों होगो चाचरों।।
कुण कुण को इलाज कराऊँ,गिणती ना टेरम टेर्याँ ली।
लम्बो घणों कड़ुम्बो कयाँ, पार पड़ैली मेराँ ली।।
हणमान्याँ की पाटी फूटगी, आँची माँगै फूलड़ी।
पैलाद्याँ को पैन्ट फाटग्यों, बान्ध्याँ डोलै जूलड़ी।।
बोद्यो बी. ए. पास करग्यो, खाली होग्यों खोफड़ो।
नौकरी की बाँर दैखताँ, होग्यों बूढ़ो डोकरो।।
बिजली को बिल आग्यों, मोटर बलगी बेराँ ली।
लम्बो घणों कड़ुम्बो कयाँ, पार पड़ैली मेराँ ली।।
तीजां काँ मेला में गुमगी, तिजड़ली की तागड़ी।
सुरज्ञानी को सुसरो मर्ग्यों ,देणों रुपयों पागड़ी।।
प्रभाती क भाँत भरणँन जाणो बीकै टापरै।
काल सिंजारो पूछायों है, सुल्तान्याँ क सासरै।।
गोरमीन्ट सूँ कुड़की आगी, धरती होगी फेरां ली।
लम्बो घणों कड़ुम्बो कयाँ, पार पड़ैली मेराँ ली।।
गुल्यों गिल्ली डण्का खेलै, काल्यों खेलै मारदड़ी।
के परखाँ को मूण्ड पढ्लो, आवै ना कक्को बारखड़ी।।
लाल्यों लाल मिर्च खाग्यो ,धोल्यों फुडा़यों खफड़ली।
लम्बो घणों कड़ुम्बो कयाँ, पार पड़ैली मेराँ ली।।