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सदस्यः:Shub Shree Nanda 83/प्रयोगपृष्ठम्

विकिपीडिया, कश्चन स्वतन्त्रः विश्वकोशः

कर्म—षट्कम्

प्रशीय चोत्थाय सदा प्रभाते,

विचिन्त्य व्यापृत्य यथा क्रमेण |

प्रस्नाय सम्पूज्य तथैव देवान् ,

वर्ते भविष्ये न कदापि पीडा ||१||

रात्रि को सोकर सुबह जल्दी उठना और क्रम से सोचकर व्यायाम करना फिर स्नान करके देवों की पूजा करना, वर्तमान में भविष्य में उसको कोई पीड़ा नहीं होती |

प्रणम्य जीवं परिश्रम्य लोके ,

अधीत्य शास्त्राणि निगम्य नूनम् |

प्रशुध्य वाचं मधुराञ्च शब्दान् ,

वर्ते भविष्ये न कदापि पीडा ||२||

उसके बाद गुरु को प्रणाम करके संसार में परिश्रम करके शास्त्रों को पढ़कर अवश्य ही ज्ञान प्राप्त करके, वाणी को शुद्ध करके मीठे शब्दों को सुनना,  वर्तमान में भविष्य में उसको कोई पीड़ा नहीं होती |

निशम्य सम्माय सदैव जीर्णान्,

ग्रन्थादिकार्यं हि समाप्य घस्रे |

प्रकृत्य शेषञ्च सुकृत्य रिक्ते ,

वर्ते भविष्ये न कदापि पीडा ||३||

हमेशा बड़ों का आदर सम्मान करना, दिन में ग्रन्थों का अध्ययन समाप्त करके, शेष कार्य जल्दी करके और करके खाली समय में,  वर्तमान में भविष्य में उसको कोई पीड़ा नहीं होती |

सम्क्रीड्य सम्क्रम्य पुनर्प्रकोष्ठे,

प्रक्षाल्य हस्तौ लपनं च पादौ |

संस्मृत्य देवान् मनसा दिनान्ते ,

वर्ते भविष्ये न कदापि पीडा ||४||

उसके बाद एक साथ खेल करके, चक्कर लगाकर वापिस कक्ष में आना, हाथों,मुख और पैरों को धोकर शाम में मन से देवों को याद करना |  वर्तमान में भविष्य में उसको कोई पीड़ा नहीं होती |

आहूय वार्ताः सुहृदं प्रकोष्ठे,

प्रप्साय रात्रौ अनुभूय हर्षम् |

प्रव्राज्य सख्या सह भोजनान्ते,

वर्ते भविष्ये न कदापि पीडा ||५||

उसके बाद कक्ष में मित्र के साथ वार्तालाप करके, रात्रि में खाना खाकर, खुशी से अनुभव करना | मित्र के साथ भोजन के बाद घूमना |  वर्तमान में भविष्य में उसको कोई पीड़ा नहीं होती |

आगत्य सम्पठ्य च पुस्तकानि ,

विलिख्य लेखं च सुभाषया वै |

प्रचेत्य नित्यं पितरौ प्रसुप्य ,

वर्ते भविष्ये न कदापि पीडा ||६ ||

फिर आकर पुस्तकों को पढ़कर, सुन्दर भाषा में कोई लेख लिखकर, माता-पिता को नित्य याद करके, सो जाना |

वर्तमान में भविष्य में उसको कोई पीड़ा नहीं होती