सदस्यसम्भाषणम्:Parambrahmapati/प्रयोगपृष्ठम्
विषयः योज्यताम्दिखावट
आत्मा बुदध्या समेत्यर्थान् मनो युङ्क्ते विवक्षया मनः कार्याग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारूतम् । मारुतस्तुरसि चरन् मन्द जनयति स्वरम् । सो जीर्णा मुहधिन्र्भहितो वकत्र मापद्य मारुतः वर्णात् जनयते तेषां विभागः पञ्चधा सृतः । स्परतः कालतः स्थानात् प्रयत्नानुप्रदनतः ॥
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