सामग्री पर जाएँ

१४. गुणत्रयविभागयोगः

विकिपीडिया, कश्चन स्वतन्त्रः विश्वकोशः

अध्यायस्य तात्पर्यम्

[सम्पादयतु]
गीतोपदेशः

श्लोकानाम् आवलिः

[सम्पादयतु]
14.1 परं भूयः प्रवक्ष्यां…..
14.2 इदं ज्ञानमुपाआश्रित्य…..
14.3 मम योनिर्महदब्रह्म…..
14.4 सर्वयोनिषु कौन्तेय…..
14.5 सत्त्वं रजस्तम इति...
14.6 तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्…..
14.7 रजो रागात्मकं…..
14.8 तमस्त्वज्ञानजं…..
14.9 सत्त्वं सुखे सञ्जयति...
14.10 रजस्तमश्चाभिं…..
भगवद्गीतायाः अध्यायाः
  1. अर्जुनविषादयोगः
  2. सांख्ययोगः
  3. कर्मयोगः
  4. ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः
  5. कर्मसंन्यासयोगः
  6. आत्मसंयमयोगः
  7. ज्ञानविज्ञानयोगः
  8. अक्षरब्रह्मयोगः
  9. राजविद्याराजगुह्ययोगः
  10. विभूतियोगः
  11. विश्वरूपदर्शनयोगः
  12. भक्तियोगः
  13. क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः
  14. गुणत्रयविभागयोगः
  15. पुरुषोत्तमयोगः
  16. दैवासुरसंपद्विभागयोगः
  17. श्रद्धात्रयविभागयोगः
  18. मोक्षसंन्यासयोगः
14.11 सर्वद्वारेषु देहे…..
14.12 लोभः प्रवृत्तिः…..
14.13 अप्रकाशो प्रवृत्तिं…..
14.14 यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु...
14.15 रजसि प्रलयं गत्वा…..
14.16 कर्मणः सुकृतस्य…..
14.17 सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं...
14.18 ऊर्ध्वं गच्छन्ति…..
14.19 नान्यं गुणेभ्यः…..
14.20 गुणानेतानतीत्य …..
14.21 कैर्लि ङ्गैस्त्रीन्…..
14.22 प्रकाशं च प्रवृत्तिं…..
14.23 उदासीनवदासीनः…..
14.24 समदुःखसुखः…..
14.25 मानापमानयोस्तुं…..
14.26 मां च योऽव्यभिं…..
14.27 ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठा…..

सम्बद्धसम्पर्कतन्तुः

[सम्पादयतु]
"https://sa.wikipedia.org/w/index.php?title=१४._गुणत्रयविभागयोगः&oldid=376203" इत्यस्माद् प्रतिप्राप्तम्